संसद में उलटफेर: सरकार बहस के पक्ष में, विपक्ष ने चर्चा से किया इनकार

नई दिल्ली, 13 ऑगस्ट: संसद में एक अनपेक्षित उलटफेर देखने को मिला. मानसून सत्र के दौरान सरकार विवादास्पद मुद्दों पर चर्चा करना चाहती थी, जबकि विपक्ष ने इससे इनकार कर दिया.

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के लिए यह सत्ता पक्ष के खिलाफ अपने तीखे हमले जारी रखने का एक महत्वपूर्ण क्षण था. चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) पर लगाए गए आरोप राज्य चुनावों में बेअसर साबित हुए हैं.

यदि एसआईआर के आरोप सही होते, तो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके क्षेत्रीय सहयोगी केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में बेहतर प्रदर्शन करते, जो भाजपा के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुए हैं.

बिहार और अन्य स्थानों पर कांग्रेस के सहयोगियों ने भी इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में कमजोर पाया. राहुल गांधी ने नीट-यूजी परीक्षा के पेपर लीक और अयोध्या में राम मंदिर के चंदे के कथित दुरुपयोग को आगामी विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण मुद्दे माना.

यदि केंद्र सरकार वास्तव में असहज होती, तो उसके मंत्री सदन में इन मुद्दों पर चर्चा का प्रस्ताव नहीं रखते. लोकसभा में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा ने विपक्ष को बार-बार बहस के लिए आमंत्रित किया.

गतिरोध को समाप्त करने के लिए अध्यक्ष ओम बिरला के कार्यालय में कई बैठकें हुईं, लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व वाले विपक्ष ने बिना किसी बयान के सभी गलतियों की जिम्मेदारी लेने की ‘अपरिवर्तनीय’ शर्तें मानने से इनकार कर दिया.

उनके लिए, यह पहले की असफलता के बाद चुनावी मुद्दों को और प्रभावी बनाने का मौका था. उन्होंने सरकार की कथित टालमटोल के खिलाफ जवाबदेही की आवाज के रूप में अपनी पहचान बनाई. उन्होंने तीन अपरिवर्तनीय शर्तें रखीं: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को स्पष्ट करना होगा कि पेपर लीक आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस फायरिंग का आदेश किसने दिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को छात्रों से माफी मांगनी होगी, और अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट में चंदे की चोरी के लिए जवाबदेही तय करनी होगी.

सरकार ने पेपर लीक विवाद को त्वरित अदालतों से संबंधित कानून से जोड़ने का प्रयास किया, जिससे संसदीय प्रक्रिया के भीतर विवाद को सुलझाने की इच्छा का संकेत मिला. केंद्रीय गृह मंत्री ने सदन में अपनी बात सुनने और जवाब देने की पेशकश की, लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ.

सरकार की सभी पेशकशों को ‘काल्पनिक बातचीत’ कहकर खारिज कर दिया गया और इस बात पर जोर दिया गया कि किसी भी चर्चा से पहले जवाबदेही होनी चाहिए. भाजपा नेताओं ने कहा कि विपक्ष बहस से भाग रहा है और उन पर संवेदनशील मुद्दों का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया. उन्होंने इस इनकार को बाधा डालने वाला बताया और दावा किया कि राहुल गांधी संसद को समाधान के मंच के बजाय चुनाव प्रचार के मंच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

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